15.9.10

गणपति की घुटन- एक ख़त भगवान का

(ये इस ब्लॉग की पहली प्रविष्टि है तो सोचा इसे भगवान गणेश को समर्पित करूँ.... ।। श्री गणेशाय नमः ।।  )

गणपति भगवान कितना  खुश होते होंगे न! गणेश चतुर्थी से दस दिन तक कितनी तवज्जो मिलती है उन्हें. अरे अपन को तो एक दिन इज्जत  मिल जाए तो दस साल याद रखें की सन 2010 में किसीने दो मिनट इज्जत से बात की थी. पर भगवान गणेश को तो हर साल दस दिन जमकर पूजा जाता है. हाँ बाकी दिन दुर्गा माँ, शनि महाराज, शिवजी आदि "कठिन" भगवानों को मनाने में लग जाते हैं. बात दरअसल ये है की कल एक ख़त मिला..भगवन गणेश का. उसपर उनका पता नहीं लिखा था! अब भगवान का पता किसे पता?मुझे ख़त लिखने का कारण यही समझ आया की भगवन ने सोचा होगा किसी "अपने" को ख़त लिखूं.और मेरा तो नाम ही "विनायक" है! मैं उनका न सही..पर नाम तो उनका अपना है. तो उस ख़त से भगवान गणेश का यही दर्द समझ आया की उन्हें कोई "seriously " नहीं ले रहा है. ये ख़त सभी "भक्तगणों" को संबोधित था तो आप सभी भक्तों के समक्ष प्रस्तुत है. 


प्रिय भक्तगणों,
                        मैं गणेश हूँ. भगवान शिव का पुत्र. मुझे आप गणपति, लम्बोदर, सिद्धिविनायक, गजानन आदि नामों से भी पुकारते हैं. जी हाँ मैं आपका वही भगवान हूँ जिसकी पूजा आप प्रथम पूज्यनीय बनाकर शुरू में ही निपटा देते हैं. क्यूंकि आपके पास और भी "भगवान" हैं खुश करने के लिए. हालांकि मैं बहुत आभारी हूँ आप लोगों का की हर वर्ष आप दस दिवसीय गणेशोत्सव मनाते हैं मेरे लिए. पर मेरी कुछ शिकायतें हैं आपसे. आप सभी मेरे पास तो आते रहते हैं अपनी शिकायत लेकर..कभी नौकरी की सिफारिश, दुश्मन से छुटकारा, कभी प्रेम का चक्कर आदि. पर इस बार कुछ मेरी शिकायतें सुनिए.


                    मैं आपसे पूछना चाहता हूँ की आप मुझे भगवान समझते भी हैं या नहीं?या आपने नए भगवान ढूंढ लिए हैं?कभी कभी लगता है की मैं एक मनोरंजन का साधन बन गया हूँ. मंदिरों के अलावा खिलौनों को दुकानों, बच्चों के डब्बों,कपड़ों , बर्तनों और न जाने कहाँ कहाँ आने लगा हूँ. माना की मेरा रूप अन्य भगवानों से अलग है पर हूँ तो मैं भगवान ही न!! चलिए इतना उपयोग मेरा ठीक है पर गणेशोत्सव के बहाने होने वाले मनोरंजक खेलों में तो आपने हद ही कर दी. अप्पको मालूम है अब मैं तम्बोला, तीन पत्ती यहाँ तक की जुआ तक खेलना सीख गया हूँ.ये सारे खेल आपने रातभर पंडाल में बैठ कर मेरे सामने खेलें है वहीँ से सीखा हूँ. आपको कोई ढंग का तरीका नहीं मिलता रात भर जागने के लिए. पंडाल की तेज़ और अनावश्यक रोशनी में आप न खुद सोते हैं न मुझे सोने देते हैं.


                      और अब आप मेरे कितने विचित्र रूप बनाने लगे हैं की मैं खुद को भी नहीं पहचान पाता. कभी  पुलिस वर्दी में, कभी फ़ुटबाल खिलाड़ी के रूप में, तो कभी सूट-बूट में. और सबसे बड़ी बात मिट्टी छोड़कर न जाने किस किस पदार्थ से मुझे बनाया जा रहा है. घी से, बर्फ से, सेल से, सिलेंडर से. पता नहीं कैसे कैसे. हे भगवान! हाँ और कैसी भयानक सजावट करते हैं आप..बड़े बड़े बंद पंडालों में, गुफाओं में बिठा देते हैं आप जहाँ मेरा दम घुटता है. अभी पिछले साल की ही बात है. मुझे एक ट्रक्टर पर बैठा कर उसे चालू कर दिया और मैं दस दिन तक लगातार ट्रक्टर चलाता रहा. लगातार. मुझे इतना क्रोध आया जितना की मुझे अपने पिता से युद्ध करते समय भी नहीं आया था.

                     
आप भक्तों के मुझ भगवान पर अत्याचारों की कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती. अब तो आप मुझे अपने पापों में भी भागीदार बनाने लगे हैं. मेरा उत्सव मनाने के लिए बिजली की चोरी, अघुलनशील पदार्थों से निर्माण कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का पाप और मेरे नाम पर लिए गए चंदे का दुरुपयोग. अब तो आपका भगवान ही खुद को पापी महसूस कर रहा है. सो हे भक्तगणों अपने इस भगवान पर कृपा करो. मुझे इतने पंडालों. इतनी मूर्तियों, इतने रूपों, इतने खर्चे की आवश्यकता नहीं है. अगर आस्था रखनी है तो अपने दिल में रखो. मुझे भी थोडा भगवानोचित सम्मान दीजिये.इससे पहले की मुझे शक होने लगे की मैं भगवान हूँ या नहीं???!!

                                                                                                                आपका भगवान
                                                                                                                       गणेश