24.2.11

एक नया रुआब दूंगा


कुछ खुशियाँ कुछ उम्मीदें कुछ ख्वाब दूंगा.
जिंदगी को अपनी मैं एक नया रुआब दूंगा.

न तुम मुझे पहचान पाओगे न मैं खुद,
अब  मैं  खुद  को ऐसा  नकाब  दूंगा.

सियासतदार से जो मैंने माँगा सुकून,
वो बोला मैं बस ज़हर दूंगा तेजाब दूंगा.

न पूछो कोई सवाल जानता हूँ सारे,
जब होगा जवाब  तो मैं जवाब दूंगा.

मांग लिया है दुनिया से वक़्त इतना,
अब मैं किस  किस  को हिसाब दूंगा.

अब न घुटने छिलेंगे न आँखें नम होंगी,
मैं उस  बच्ची के  हाथों में किताब दूंगा.

-विनायक

1 comment:

  1. मैं वही कहूँगा जो फेसबुक पर कहा था- सराहनीय प्रयास...!

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हाँ तो क्या राय है आपकी.. :)