12.10.10

हमने वो कत्लेआम देखा.

इस रचना की प्रेरणा (click here)--
ख़ारिज़ रचनाएँ- By Lalit Kishore Gautam 


हर गली में कूचे में सुबह और शाम देखा,
जो तुमने देखा हमने भी सरेआम देखा.

इंसानियत कोने  में बैठी सिसकती देखी,
हमने दहशत को मिलता इनाम देखा.
मरने से पहले  तक  तो इंसान था वो,
सूरत-ए-मौत पर मज़हब का नाम देखा.
देखी  सड़कें  हमने  सुर्ख लाल होती,
हर एक मोड़ पर हमने शमशान देखा.
उन चेहरों  की  चढ़ती त्योरियां देखी,
जिनपे  था  कभी दुआ-सलाम देखा.
बेजुबानों को भी देखा दर्द समझते,
बेदिल  तो  हमने  बस  इंसान  देखा.
ग़म  तो  बस ये की कुछ कर न सके,
हमने चुपचाप ये किस्सा तमाम देखा.

जो तुमने देखा हमने भी सरेआम देखा.
हुआ गुनाह हमसे हमने वो कत्लेआम देखा.


-विनायक

4 comments:

  1. यूँ कुछ कमियां तो हैं इस रचना मे पर प्रयास अच्छा है।

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  2. शुक्रिया... कमियां दूर करने की कोशिश जारी रहेगी. :)

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हाँ तो क्या राय है आपकी.. :)